जब विराट कोहली के पैर कांप रहे थे: उनके करियर का सबसे कठिन दौर
विराट कोहली: जब आत्मविश्वास ने दे दिया था साथ
विराट कोहली का नाम लेते ही जहन में एक ऐसे बल्लेबाज की छवि उभरती है जो मैदान पर अपनी आक्रामकता और रनों की भूख के लिए जाना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आधुनिक क्रिकेट के इस दिग्गज को भी अपने करियर में एक ऐसे दौर का सामना करना पड़ा था, जब उनका आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा गया था?
(फोटो साभार: X.com)
हाल ही में विराट कोहली ने अपने करियर के उस काले अध्याय को याद किया है, जो साल 2014 के इंग्लैंड दौरे के रूप में सामने आया था। एक पूर्व भारतीय कप्तान के रूप में अपनी धाक जमाने वाले कोहली ने बताया कि उस समय वे किस तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहे थे। टेस्ट सीरीज में लगातार असफलताएं मिलने के बाद उनका मन पूरी तरह थक चुका था।
‘हर सुबह असफलता का डर’
कोहली ने अपने उस अनुभव को साझा करते हुए कहा, “2014 का इंग्लैंड दौरा मेरे क्रिकेट करियर का सबसे खराब दौर था। हर सुबह जब मैं उठता था, तो मुझे पता होता था कि आज मैं फिर फेल होने वाला हूं, लेकिन फिर भी खुद को मैदान पर उतरने के लिए मजबूर करना पड़ता था।”
इतना ही नहीं, उन्होंने उस समय की एक भावुक घटना का जिक्र करते हुए कहा, “पहले वनडे मैच में भी जब मैं बल्लेबाजी करने जा रहा था, तो मेरे पैर कांप रहे थे। मैंने खुद से वादा किया कि मैं हर गेंद को छक्के के लिए मारूंगा। मैंने एक शॉट खेला और गेंद सीधे मिड-ऑफ पर खड़े फील्डर के हाथों में गई और मैं शून्य पर आउट हो गया। हालांकि वह एक असफलता थी, लेकिन उस शॉट को खेलने के बाद मुझे बहुत राहत महसूस हुई क्योंकि मैंने डर के आगे जाकर खेलने की कोशिश की थी।”
एलीट एथलीटों का मानसिक संघर्ष
यह बयान स्पष्ट करता है कि शीर्ष स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ियों को किस तरह के मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। प्रशंसक अक्सर केवल उनके रिकॉर्ड, शतक और जीत का जश्न देखते हैं। लेकिन इस तरह के किस्से हमें यह समझने पर मजबूर करते हैं कि प्रोफेशनल स्पोर्ट के पीछे खिलाड़ियों की भावनाएं कितनी गहरी होती हैं। 2014 की उस टेस्ट सीरीज में कोहली इंग्लैंड की स्विंग होती गेंदों के सामने बुरी तरह संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने 10 पारियों में केवल 134 रन बनाए थे। विशेष रूप से जेम्स एंडरसन की गेंदों ने उन्हें ऑफ स्टंप के बाहर खूब छकाया था।
असफलता से वापसी का सफर
कोहली की यात्रा की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने असफलता से मुंह मोड़ने के बजाय उसका सामना किया। उन्होंने हार को स्वीकार किया और खुद को बेहतर बनाने के लिए कठिन परिश्रम जारी रखा। वनडे सीरीज में शून्य पर आउट होने के बावजूद, उन्होंने जिस तरह से ‘डर’ को बाहर निकालकर खेलने का निर्णय लिया, वही उनके मानसिक मजबूती का प्रमाण था।
यह कठिन दौरा अंततः उनके करियर का ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। उन्होंने अपनी तकनीक और मानसिकता पर काम किया। इसका परिणाम यह हुआ कि चार साल बाद, 2018 के इंग्लैंड दौरे पर जब वे लौटे, तो वे एक बिल्कुल अलग और निडर बल्लेबाज थे। उन्होंने उस सीरीज में अपने बल्ले से बेहतरीन प्रदर्शन किया और साबित कर दिया कि असफलता ही सफलता की सबसे बड़ी सीढ़ी है।
विराट कोहली का यह अनुभव आज के उभरते हुए युवा खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी सीख है कि खराब दौर हर किसी के जीवन में आता है, लेकिन उसे पार करके निकलना ही एक चैंपियन की असली पहचान है।